24 नवम्बर 2011 सुरक्षा बलों के साथ पश्चिम बंगाल के बुरीसोल के जंगल में मुठभे़ड़ में मारा गए मुल्लाजोला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी का जन्म आन्ध्र प्रदेश के करीमनगर जिले के पेडापल्ली कस्बे में एक स्वतंत्रता सेनानी के घर 26 नवम्बर 1956 को हुआ था।
किशनजी के पिता कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे। किशनजी ब्राह्मण परिवार हुआ था।उनका परिवार आस-पास के मंदिरों में पूजा-पाठ कर अपनी आजीविका चलता था। किशनजी की आरंभिक पढ़ाई आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले में हुई। पुलिस को अपने स्कूल के आगे फायरिंग करते हुए देख उसने तय कर लिया कि वह माओवादी संगठन में शामिल होगा।
सन 1973 में गवर्नमेंट डिग्री कालेज से गणित में बीएससी करने के बाद किशनजी कानून की पढ़ाई करने हैदराबाद चला गया।
हैदराबाद आकर उसने कट्टरपंथी छात्र संघ की स्थापना की। आपातकाल के दौरान वह भूमिगत हो गया। किशनजी को प्रभावित करने वालों में लेखक वरावर राव जिन्होंने रिवोल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना की,भारत के राजनीतिक हालत और आस-पास का वातावरण रहा,जिसमें वह बड़ा हुआ।
नक्सली विचारक और प्रमुख रणनीतिकार किशनजी कानून की पढ़ाई करते समय ही भूमिगत हो गया था और उसके बाद उसने अपने कस्बे या परिवार की तरफ कभी नहीं झांका।
किशनजी की मौत पर जब उसकी भतीजी दीपा राव को उसकी लाश को पहचानने के लिए बुलाया गया तो दीपा ने बताया कि वह 1985 के बाद वह उन्हें पहली बार देख रही है।
किशनजी जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)में शामिल हुए तो उसके पिता ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को यह कहते हुए छोड़ दिया कि एक ही छत के नीचे दो तरह की राजनीति विचारधारा जीवित नहीं रह सकती । किशनजी के पिता समाजवाद में विश्वास करते थे न की सशस्त्र संघर्ष में।
1977 में जब आपातकाल हटा तो उसने सामंतवाद के खिलाफ करीमनगर के जगितिअल और सिरिसिल्ला में एतिहासिक किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। करीब 60,000 किसानों ने इस आन्दोलन में भाग लिया। यही आन्दोलन बाद में आगे चल कर 1980 के दशक में नक्सल नेता कोंडापल्ली सीथारमैया के नेतृत्व में पीपुल्स वार ग्रुप के गठन का कारण बना।
किशनजी जब कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)के आंध्र प्रदेश की राज्य समिति के सचिव थे उसी दौरान पुलिस ने तलाशी अभियान के दौरान पेडापल्ली स्थित उनके घर पर छापा मारा। पार्टी ने गिरफ्तारी से बचाने के लिए किशनजी को छत्तीसगढ़ के दण्डकारन्य के जंगलों में भेज दिया। यहां से वह पश्चिम बंगाल और फिर झारखण्ड चला गया। इसी दौरान उसने मैनक्का से शादी की। उसकी पत्नी भी माओवादी बन गई।
पिछले दो दशकों के दौरान किशनजी अपना नाम बदल कर एक राज्य से दूसरे राज्य में नक्सली गतिविधियों को अंजाम देता रहा। उसके चर्चित उपनाम थे मुरली,प्रदीप विमल और प्रह्लाद। करीब बीस सालों तक महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में रहने के बाद वह स्थायी रूप से पश्चिम बंगाल चला गया। यहां पहुंच कर उसने संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाका जंगलमहल,जो झारखण्ड से सटा हुआ है,में उसका कद काफी बड़ा था। वह जल्द ही पूर्वी भारत में सबसे प्रमुख माओवादी नेता बन गया। 2003 में पीपुल्स वार ग्रुप और भारत के माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय में उसने अहम भूमिका निभाई। विलय के बाद संगठन का नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) हो गया।
किशनजी के बार में कहा जाता है कि वह मृदू भाषी,पढ़ा लिखा और नई तकनीक को जानने वाला था। वह छह भाषाओं,अंग्रेजी,तेलगु बंगाली हिंदी और संथाली और ओड़िया में धाराप्रवाह बात करता था।
कहा जाता है कि 2009 मई में वह मीडिया से पहली बार मुखातिब हुआ। इसके बाद वह प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अक्सर साक्षात्कार दिया करता था। माओवादी नेताओं में उसे सबसे ज्यादा मीडिया फ्रेंडली माना जाता था। एक साक्षात्कार में उसने स्वीकार किया था की उसने करीब सौ लोगों को मारा है।
किशनजी के परिवार में उसकी मां मधुरम्मा,बड़े भाई अंजानेयुलू है।





